राजा विक्रम और बेताल की कहानी

 राजा विक्रम और बेताल की कहानी

एक बार की बात है, राजा विक्रमादित्य ने एक योगी को प्रसन्न करने के लिए एक चुनौती स्वीकार की। योगी ने उन्हें एक पीपल के पेड़ से लटके एक बेताल (भूत) को पकड़कर लाने को कहा। बेताल शव में बसा एक चंचल प्रेत था, जो राजा को रास्ते भर कहानियाँ सुनाता और उनसे पहेलियाँ पूछता। अगर राजा ने जवाब दिया, तो बेताल वापस पेड़ पर लौट जाता, और अगर चुप रहे, तो राजा का सिर फटने का डर था। ऐसे ही एक रोचक प्रसंग की कहानी है:


किसका बलिदान?

बेताल ने कहानी शुरू की:

"एक नगर में चंद्रकेतु नाम का राजा राज करता था। एक दिन उसके दरबार में एक साधु आया और बोला, 'महाराज, मैं एक यज्ञ करना चाहता हूँ, पर उसके लिए एक बहादुर राजकुमार का बलिदान चाहिए। आपका पुत्र ही योग्य है।' राजा ने धर्मसंकट में पड़कर अपने पुत्र को दे दिया। रास्ते में साधु और राजकुमार को एक युवक मिला, जो बोला, 'मुझे बलिदान करो, मैं अनाथ हूँ।' साधु ने कहा, 'राजा, अब तुम तय करो—तुम्हारा पुत्र हो या यह युवक?'"


बेताल ने राजा विक्रम से पूछा, "बताओ, राजा चंद्रकेतु को किसका बलिदान करना चाहिए था? याद रखो, गलत जवाब देने पर तुम्हारा सिर फट जाएगा!"


विक्रम ने सोचकर उत्तर दिया, "राजा का पहला कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना है। उसने अपने पुत्र को साधु को देकर धर्म का पालन किया, लेकिन जब एक निर्दोष युवक ने स्वयं को पेश किया, तो राजा को अपने पुत्र का ही बलिदान करना चाहिए था। क्योंकि एक राजा के लिए प्रजा का बच्चा भी अपना ही होता है।"


विक्रम का जवाब सुनकर बेताल हँसा और बोला, "तुमने सही उत्तर दे दिया, इसलिए अब मैं वापस पेड़ पर जाता हूँ!" और वह शव लेकर उड़ गया। राजा विक्रम फिर उसे पकड़ने के लिए दौड़ पड़े...

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